|| लॉक डाउन ||
आजकल मेरे कमरे के सामने की गलियों में कुत्तों के भौंकने की कोई आवाज़ नहीं आ रही |
कुछ दिन पहले तक तो रात में इनके रोने की, भौंकने की आवाजें बढ़ गयी थी, वही जब लॉक डाउन स्टार्ट हुआ था | शायद बढ़ती भूख़ की वज़ह से |
और लॉक डाउन से पहले तो मत पूछो | क्या भौंकते थे ! ...जब सब कुछ नार्मल था | ऐसा लगता था जैसे दो गुटों में भौंकने की प्रतियोगिता चल रही हो | हर रात को करीब २ बजे यह प्रतियोगिता शुरु हो जाती थी | जमकर भौंकने के बाद ये शांत हो जाते थे |
अभी सारा देश कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए लॉक डाउन हुआ पड़ा है | सारी दुकानें बंद पड़ी हैं | और सबसे महत्वपूर्ण तो यह की जो सड़क के किनारे की रेड़ी होती थी, वो सब बंद हो जाने के कारण इन जानवरों को कहीं भी कुछ खाने को नहीं मिल पा रहा | घरों से निकलते कूड़ों में भी अब कुछ फालतू भोजन नहीं जा रहा | सभी जानवर गली के हर कूड़ेदान में भूख मिटाने की नाकामयाब कोशिश कर रहे | रेडियाँ होती थी तो ये कहीं दोने-पत्तल चाट के भी काम चला लेते थे | नहीं तो कुछ इंसानों के फेंकें खाने खा के मस्त रहते थे | कूड़े में मुँह डालते थे तो कभी-कभी चिकन भी खाने को मिल जाता था | कुछ डॉग लवर्स होते थे जो इन्हे कुछ खिला देते थे | कुल मिलाकर कोई भी कुत्ता, बिल्ली भूखा तो नहीं ही रहता था | यहाँ तक की गायों को भी घास फूस के अलावा कुछ स्वादिस्ट खाने मिल जाता था | लॉक डाउन के बाद अब समझ आता है इन सड़क के किनारे की छोटी-छोटी दुकानों का महत्व | जीवन का आधार हैं ये - अनगिनत जानवरों के लिए |
लॉक डाउन के कुछ दिन बाद इन कुत्तों को गाय के एक बछड़े को घेरते हुए देखा था |
गाय अपने बछड़े को बचाने के लिए सारे कुत्तों को बार-बार घूम-घूम कर सींग मारती | यह करीब पंद्रह मिनट तक चला होगा | फिर कुछ और गायों का झुण्ड आ जाता है और फिर बछड़ा सुरक्षित चला जाता है झुण्ड के साथ | उसके कुछ दिन बाद से गायें नहीं दिख रही | शायद शाकाहारी होने के कारण वो घास खा के भी जिन्दा रह सकती हैं | चली गयी होंगी किसी गाँव की तरफ़। आजकल गायें भी नहीं दिख रही गली में |
एक सीरीज देखी थी - चिरनोबिल |
'चिरनोबिल' टी वी सीरीज़ में एक सीन होता है जब नुक्लिअर रिएक्टर के एक्सप्लोज़न के बाद पूरे चिरनोबिल शहर को खाली करने का आर्डर दिया जाता है |
मिलिट्री पूरी जनता को दूसरे शहर ट्रांसफर करने में लगी होती है | ऐसे में एक मिलिट्री ग्रुप होती है जो जानवरों को मारने के लिए बनाई जाती है | चूँकि सारे जानवर रेडिएशन के सम्पर्क में आ चुके थे तो उन्हें जान से मारने के सिवा कोई विकल्प नहीं था | इसमें से कुछ गली के कुत्ते, बिल्ली होते थे , तो कुछ पालतू | खाने पीने की समस्या के कारण आपातकालीन स्थिति में इन जानवरों के मालिक इन्हे अपने साथ नहीं ले जा सकते थे और जानवरों को ले जाने का परमिशन भी नहीं था | ऐसे ही एक मिलिट्री ग्रुप में तीन सैनिक होते हैं जिसमें एक नया लड़का होता है | उसने कभी कोई जंग नहीं लड़ी थी | जब वो जानवरों को मारने जाते हैं तो ये नया सैनिक पूछता है कि ये जानवर अभी, इतने महीनों से जिन्दा कैसे हैं बिना अपने मालिकों के ? तो बाकी दो अनुभवी जवानों में से एक बोलता है - ये पहले तो मुर्गी, चूहे, ख़रगोश या बिल्ली खाते हैं | जब सब कुछ ख़तम हो जाता है तो फ़िर ये एक दूसरे को खाने लगते हैं | यह जवाब सुनकर वो नया सैनिक कुछ देर के लिए ठिठक जाता है, कुछ सोचता है फिर अपने कर्त्तव्य को याद कर अपने नए साथियों के साथ जानवरों को मारने चल देता है |
कुछ ऐसा ही घटा था मेरे रूम से लगे सड़क पर, यही कुछ सौ, डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर |
यह बात कुछ दिन पहले की है, जब कुत्ते दिखते थे इस गली में | हुआ यूँ कि मैं अपने रूम में सो रहा था | किसी कुत्ते के चिल्लाने की आवाज़ से उठ गया | बहुत भयानक थी उसकी आवाज़ | तुरंत दरवाजा खोल कर बालकनी में भगा | दोपहरी का समय था | क्या देखता हूँ कि कुछ पाँच-छह कुत्ते मिलकर एक कुत्ते को काट रहे थे | ज़वाब में वो कुत्ता बहुत तेज़ी से चिल्ला रहा था | वह कितना भी कोशिश करता भागने की, बाकी कुत्ते उसे दबोच लेते थे, दौड़ाकर | मेरे जैसे ही कुछ और आँखें अपने बालकनी से इस मंज़र को देख रहीं थी | इन खूँखार हो चुके भूखे कुत्तों के सामने जाने की मेरी हिम्मत तो न थी | बस खड़ा रहा बालकनी में जब तक की उस घिरे हुए कुत्ते का विरोध ख़त्म नहीं हो गया | बाकी कुत्ते खाने में लग गए, अभी-अभी मार गिराए अपने भोजन को | कल को हो सकता है इन्हीं में से कोई एक इनका अगला भोजन हो | उस सैनिक की कही बात को साक्षात् अपनी आँखों से देख रहा था |
आलम यह है कि बाहर बस कुत्ते ही हैं - एक दूसरे के साथी भी और एक दूसरे के भोजन भी | कुछ कुत्ते मिलकर एक कुत्ते को घेर लेते हैं फिर उसे नोच नाच के खाते हैं | अगले दिन कोई और कुत्ता शिकार होगा | यह क्रम चलता रहेगा शायद जब तक लॉक डाउन न ख़त्म हो |
व्याकुल मन से मैं अपने कमरे में आ गया | फिर मेरा मन पूछने लगा इंसानों के बारे में |
इंसान क्या करता ऐसी भूखमरी की स्थिति में ?
हाँ ?
---- जंग बहादुर पटेल
आजकल मेरे कमरे के सामने की गलियों में कुत्तों के भौंकने की कोई आवाज़ नहीं आ रही |
कुछ दिन पहले तक तो रात में इनके रोने की, भौंकने की आवाजें बढ़ गयी थी, वही जब लॉक डाउन स्टार्ट हुआ था | शायद बढ़ती भूख़ की वज़ह से |
और लॉक डाउन से पहले तो मत पूछो | क्या भौंकते थे ! ...जब सब कुछ नार्मल था | ऐसा लगता था जैसे दो गुटों में भौंकने की प्रतियोगिता चल रही हो | हर रात को करीब २ बजे यह प्रतियोगिता शुरु हो जाती थी | जमकर भौंकने के बाद ये शांत हो जाते थे |
अभी सारा देश कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए लॉक डाउन हुआ पड़ा है | सारी दुकानें बंद पड़ी हैं | और सबसे महत्वपूर्ण तो यह की जो सड़क के किनारे की रेड़ी होती थी, वो सब बंद हो जाने के कारण इन जानवरों को कहीं भी कुछ खाने को नहीं मिल पा रहा | घरों से निकलते कूड़ों में भी अब कुछ फालतू भोजन नहीं जा रहा | सभी जानवर गली के हर कूड़ेदान में भूख मिटाने की नाकामयाब कोशिश कर रहे | रेडियाँ होती थी तो ये कहीं दोने-पत्तल चाट के भी काम चला लेते थे | नहीं तो कुछ इंसानों के फेंकें खाने खा के मस्त रहते थे | कूड़े में मुँह डालते थे तो कभी-कभी चिकन भी खाने को मिल जाता था | कुछ डॉग लवर्स होते थे जो इन्हे कुछ खिला देते थे | कुल मिलाकर कोई भी कुत्ता, बिल्ली भूखा तो नहीं ही रहता था | यहाँ तक की गायों को भी घास फूस के अलावा कुछ स्वादिस्ट खाने मिल जाता था | लॉक डाउन के बाद अब समझ आता है इन सड़क के किनारे की छोटी-छोटी दुकानों का महत्व | जीवन का आधार हैं ये - अनगिनत जानवरों के लिए |
लॉक डाउन के कुछ दिन बाद इन कुत्तों को गाय के एक बछड़े को घेरते हुए देखा था |
गाय अपने बछड़े को बचाने के लिए सारे कुत्तों को बार-बार घूम-घूम कर सींग मारती | यह करीब पंद्रह मिनट तक चला होगा | फिर कुछ और गायों का झुण्ड आ जाता है और फिर बछड़ा सुरक्षित चला जाता है झुण्ड के साथ | उसके कुछ दिन बाद से गायें नहीं दिख रही | शायद शाकाहारी होने के कारण वो घास खा के भी जिन्दा रह सकती हैं | चली गयी होंगी किसी गाँव की तरफ़। आजकल गायें भी नहीं दिख रही गली में |
एक सीरीज देखी थी - चिरनोबिल |
'चिरनोबिल' टी वी सीरीज़ में एक सीन होता है जब नुक्लिअर रिएक्टर के एक्सप्लोज़न के बाद पूरे चिरनोबिल शहर को खाली करने का आर्डर दिया जाता है |
मिलिट्री पूरी जनता को दूसरे शहर ट्रांसफर करने में लगी होती है | ऐसे में एक मिलिट्री ग्रुप होती है जो जानवरों को मारने के लिए बनाई जाती है | चूँकि सारे जानवर रेडिएशन के सम्पर्क में आ चुके थे तो उन्हें जान से मारने के सिवा कोई विकल्प नहीं था | इसमें से कुछ गली के कुत्ते, बिल्ली होते थे , तो कुछ पालतू | खाने पीने की समस्या के कारण आपातकालीन स्थिति में इन जानवरों के मालिक इन्हे अपने साथ नहीं ले जा सकते थे और जानवरों को ले जाने का परमिशन भी नहीं था | ऐसे ही एक मिलिट्री ग्रुप में तीन सैनिक होते हैं जिसमें एक नया लड़का होता है | उसने कभी कोई जंग नहीं लड़ी थी | जब वो जानवरों को मारने जाते हैं तो ये नया सैनिक पूछता है कि ये जानवर अभी, इतने महीनों से जिन्दा कैसे हैं बिना अपने मालिकों के ? तो बाकी दो अनुभवी जवानों में से एक बोलता है - ये पहले तो मुर्गी, चूहे, ख़रगोश या बिल्ली खाते हैं | जब सब कुछ ख़तम हो जाता है तो फ़िर ये एक दूसरे को खाने लगते हैं | यह जवाब सुनकर वो नया सैनिक कुछ देर के लिए ठिठक जाता है, कुछ सोचता है फिर अपने कर्त्तव्य को याद कर अपने नए साथियों के साथ जानवरों को मारने चल देता है |
कुछ ऐसा ही घटा था मेरे रूम से लगे सड़क पर, यही कुछ सौ, डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर |
यह बात कुछ दिन पहले की है, जब कुत्ते दिखते थे इस गली में | हुआ यूँ कि मैं अपने रूम में सो रहा था | किसी कुत्ते के चिल्लाने की आवाज़ से उठ गया | बहुत भयानक थी उसकी आवाज़ | तुरंत दरवाजा खोल कर बालकनी में भगा | दोपहरी का समय था | क्या देखता हूँ कि कुछ पाँच-छह कुत्ते मिलकर एक कुत्ते को काट रहे थे | ज़वाब में वो कुत्ता बहुत तेज़ी से चिल्ला रहा था | वह कितना भी कोशिश करता भागने की, बाकी कुत्ते उसे दबोच लेते थे, दौड़ाकर | मेरे जैसे ही कुछ और आँखें अपने बालकनी से इस मंज़र को देख रहीं थी | इन खूँखार हो चुके भूखे कुत्तों के सामने जाने की मेरी हिम्मत तो न थी | बस खड़ा रहा बालकनी में जब तक की उस घिरे हुए कुत्ते का विरोध ख़त्म नहीं हो गया | बाकी कुत्ते खाने में लग गए, अभी-अभी मार गिराए अपने भोजन को | कल को हो सकता है इन्हीं में से कोई एक इनका अगला भोजन हो | उस सैनिक की कही बात को साक्षात् अपनी आँखों से देख रहा था |
आलम यह है कि बाहर बस कुत्ते ही हैं - एक दूसरे के साथी भी और एक दूसरे के भोजन भी | कुछ कुत्ते मिलकर एक कुत्ते को घेर लेते हैं फिर उसे नोच नाच के खाते हैं | अगले दिन कोई और कुत्ता शिकार होगा | यह क्रम चलता रहेगा शायद जब तक लॉक डाउन न ख़त्म हो |
व्याकुल मन से मैं अपने कमरे में आ गया | फिर मेरा मन पूछने लगा इंसानों के बारे में |
इंसान क्या करता ऐसी भूखमरी की स्थिति में ?
हाँ ?
---- जंग बहादुर पटेल
No comments:
Post a Comment