Wednesday, 5 December 2018

मैडम! अपना 'बिल' दे दिया आपने ?

|| मैडम! अपना 'बिल' दे दिया आपने ? ||

बात पिछले महीने की है | जब मैं और मेरे दोस्त Cyber  hub - गुड़गांव गए थे| पहले तो हम साइबर हब घूम रहे थे | घूम क्या रहे थे , कह सकते हैं कि आनंद उठा रहे थे | एक्चुअली क्या है कि जब भी आप साइबर हब में होते हैं, तो आप को देवताओ जैसी फीलिंग आने लगती है | ऐसा लगता है मानो हम स्वर्ग में हैं और इधर उधर बस अप्सराएं ही अप्सराएं दिख रही है | हालात से मजबूर, स्वभाव से ठरकी, मेरा स्कैनर बखूबी अपना काम कर रहा था | घंटों घूमने के बाद ये साइबर हब का हमारा आखिरी राउंड था | इसके बाद हमने डिनर करना था | हम घूम ही रहे थे कि सामने चार लड़कियों का एक group आ रहा था | वैसे तो मुझे हर लड़की पसंद ही आ जाती है | लेकिन चश्मे वाली लड़कियों में कुछ अलग ही बात होती है | और ऊपर से कॉंफिडेंट हो तो Killer ही समझो | मुझे  एक लड़की उनमे पसंद आ गयी | लेकिन इस बार बात कुछ अलग ही थी | बगल से गुजरते समय एक बेहद आकर्षक, मधुर और कॉंफिडेंट 'आवाज' ने मानो मन मोह लिया | वाह कितनी मधुर थी उसकी आवाज ! | अब मैंने कंकन से रिक्वेस्ट किया कि भाई! एक बार चलो | एक बार फिर से, बस देख के आ जाऊँगा | देखना तो क्या था, सुनना ही था | फिर आकर  घूम लेंगे |

PRA PRA  PRANK के पास के ऊपर को जाती स्वचालित सीढ़ियों से हम सब उनके पीछे पीछे थे | वो अब १स्ट फ्लोर पे आगे बढ़ने लगीं | और थोड़ी देर आगे जाकर वो खाने के लिए NOT JUST PARATHAAS के रिसेप्शन पे खड़ी थी | मैंने देखा कि उसी confident एंड pleasant sounded गर्ल ने सीट बुक किया | और अंदर चली गयी | चूँकि पहले से तय था कि हम डिनर करेंगे, तो इससे अच्छा रेस्टोरेंट नहीं था डिनर करने के लिए, फ़िलहाल  मेरे लिए | मैंने कन्विंस किया कि भाई ये इंडियन फ़ूड का बेस्ट रेस्टोरेंट है | मजा आएगा इसमें खा के | 'लेटस गो' | उम्मीद के मुताबिक, सब तैयार थे |

मैंने जाकर रिसेप्शन पे सीट बुक किया | है रे फुटी किस्मत| "रेस्टोरेंट जस्ट गॉट फुल"| मेरी अंग्रेजी ऐसी ही है | उसने हमें १५ मिनट का वेटिंग टाइम दिया | हम बाहर ही बैठ के वेट करने लगे | पंद्रह मिनट के बाद अपना नंबर आ गया |इस रेस्टोरेंट के दो पार्ट्स हैं, ओपन एयर एंड अंडर रूफ |  हम रेस्टोरेंट के अंदर 'अंडर रूफ' वाले सेक्शन में फर्स्ट सीट पर बैठ गए, जो दरवाजे की बिलकुल पास थी|  उसका कारण था कि एक तो वही सीट खाली थी | दूसरी कि जो 'प्लीजेंट सॉउन्डेड गर्ल' का ग्रुप था, वो रेस्टोरेंट के दूसरे हिस्से, जो कि ओपन एयर में था, उसमे बैठी थी | एक वेटर उनका आर्डर ले रहा था | मैं बाहर की तरफ चेहरा करके बैठा था |  सब कुछ सही और ठीक ठीक जगह पर था |

मौर्या ने  menu मंगाया | menu तो क्या था, अख़बार ही समझो | ध्यान से देखने पे लगता है , कि ओह! ये तो menu है | थोड़ी देर में पीतल के गिलास और मिनरल वाटर भी हमारे सीट पर सज गए | उधर लड़कियों का खाना पीना चल रहा था | हाहाकार भी | इनको देख के,  एक गजल सुनी थी, वो याद आती  है , कि

'' न जाने तेरे शहर का, क्या इरादा है ?
आसमान कम, परिंदे ज्यादा हैं | "

ठीक उसी तरह, ये लड़किया भी | डिनर के टाइम, 'खाती कम, हंसती ज्यादा है' | जो होना चाहिए, वो नहीं करती |
मुझे तो आज तक इसका कारण न समझ आया  | आप लोग भी समझने कि कोशिश न करें तो बेहतर है | गर्ल्स थिंग | लेट इट बी मिस्टीरियस |


खैर अपने टेबल पे अब बियर और चुर-चुर परांठा आ चुका था | हम अब अपने में मगन थे | आपस कि बातों में | हमारी बातें कुछ ज्यादा स्पेशल नहीं होती| generally हम लड़को की दो ही बातें होती है | पहला... पहला तो you guessed it right . लड़कियों कि बातें | दूसरी ... वेल, लेट में थिंक ऑफ़ इट | जिंदगी के जिस पड़ाव से हम गुजर रहे हैं, इसमें तो भाई 'दूसरी बात' जैसी कोई बात नहीं होती | तो कुल मिला जुला कर हम लड़कियों कि बातें कर रहे थे | जैसे एक माँ का ध्यान किसी औरत से बात करते समय, पास में खेलते अपने बच्चे पे रहता है, और दूसरी तरफ बात करती औरत पर भी| ठीक उसी तरह मेरा भी ध्यान एक तरफ अपने टेबल पे था तो दूसरी तरफ 'प्लीजेंट सॉउन्डेड गर्ल'स टेबल' पर |

बातों बातों में लगभग एक घंटे हो गए | सामने की टेबल से फ़ूड बिल लाने का आर्डर हुआ | आप अनुमान लगा सकते हैं कि किस गर्ल ने आर्डर दिया होगा| जी हाँ , 'प्लीजेंट सॉउन्डेड गर्ल' ने | थोड़ी देर बाद वेटर बिल लेकर आ गया | वैसे तो सुना है कि लड़किया बिल pay करने में थोड़ा टाइम लेती हैं | वो decide करने में कि बिल कौन चुकाएगा | पर यहाँ ऐसा कुछ न हुआ| card swiped , bill paid. So called , 'प्लीजेंट सॉउन्डेड गर्ल' ने बिल pay किया |

normally यहाँ  जो वेटर आर्डर लेता है, बिल आर्डर भी वही ले जाता है | इनके साथ थोड़ा फेर बदल हो गया था|
करीब ५ मिनट बाद जब पैसे देकर वो अपने टेबल से उठ रही थी | अभी वो पूरा उठी भी नहीं थी| शरीर जस्ट चेयर से उठा ही था कि उनको जाते देख एक वेटर ने मेरे पास से जोर से आवाज लगाई , जिसने उनका फ़ूड आर्डर लिया था|

मिस-कम्युनिकेशन कि वजह से उसे पता नहीं था कि उन्होंने अपना बिल pay कर दिया है, उनको उठते देख उसके मुंह से तेज आवाज में निकल पड़ा |

" मैडम! अपना 'बिल' दे दिया आपने ? "

'बिल' पे ज्यादा एम्फेसिस हो गया | मेरे दिमाग में एक ही चीज़ आयी, कि अभी अभी वेटर ने क्या सवाल कर दिया ?

शायद उन चारों लड़कियों के भी दिमाग में कुछ ऐसा ही चला | एक क्षण के लिए वो अवाक, चुप| चारों ने एक दूसरे की ओर देखा | ३ सेकंड की  भयंकर चुप्पी | फिर ... अचानक चारों, एक साथ जोर से फट पड़ी | ठहाके लगा के हॅसने लगी | अगल-बगल के सब लोग उनको देखने लगे | वेटर को कुछ समझ नहीं आया | वो वही खड़ा रहा | हँसते - हँसते, सो कॉल्ड 'प्लीजेंट सॉउन्डेड गर्ल' ने बोला, कि भैया, "बिल न ! दूसरे वाले भैया लेकर चले गए"... | चारों फिर चुप | फिर चारों ने एक दूसरे की तरफ देखा | इस बार जो फटी, की बस पूछो ही मत | 'तू क्या बोल रही...' बिल' दूसरे वाले भैया लेकर चले गए " .. हद्द है तू भी', मतलब भैया बोले ....अब तू भी ..."|  और हँसते- लड़खड़ाते, शोल्डर-पर्स सँभालते, वो अपनी टेबल से निकली | रिसेप्शन पार कर ठहाके लगाकर बाहर ही हंसने लगी |"बिल','दूसरे वाले भैया' कह- कह क्र बाहर भी हसे जा रही | इधर मुझसे भी हंसी रोकी नहीं जा रही थी |

बाहर वाले सारे उन्हें ही देख रहे |
रजत ने मुझसे उत्सुकतावश पूछा - अबे क्या हुआ ? क्या हुआ ? तू क्यों हँस रहा है ?

मैं , हँसते - हँसते, पीतल के गिलास में पानी भरते हुए - "चल बताता हूँ "|

---- 'जंग'

Sunday, 28 January 2018

शर्मा जी

धत्त... | दुर्र... | दुर्र... | शर्मा जी हाथ में लिए अख़बार से उनकी कुर्सी के बगल में बैठे कुत्ते को अपने से दूर कर रहे थे |एक दो बार ऐसा करने पर भी सेठू अपनी जगह से हिला नहीं | सेठू उनकी धर्मपत्नी का राजदुलारा, प्यारा,
आँखों का तारा, जो भी कह लो,  था | सेठू के प्रति उनका प्यार का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं
कि शर्मा जी से भी  पहले भोजन उनके राजदुलारे सेठू को ही मिलता था | ये बात हो या कुछ और भी |
लेकिन शर्मा जी को सेठू और उसके पूरी जाति से नफ़रत थी | नफरत कह लो या डर | यहाँ एक ही बात थी |

अबकी बार शर्मा जी ने उसे भगाने के लिए अपने पैरों का इस्तेमाल किया |  इस बार सेठू को आ गया गुस्सा | उसने पैर को अपनी तरफ आते देख जोर से भोंकना चालू कर दिया | और काटने को दौड़ पड़ा | अब शर्मा जी के डर का चमत्कार देखिये कि शर्मा जी कुर्सी  से गिरे और जिस तेजी से उठ कर घर के अंदर कि ओर भागे , कि बस मत पूछो | अख़बार कब सीढ़ियों पर गिरा ? शर्मा जी कब घर में बिस्तर पर आ गये , खुद शर्मा जी को भी नहीं पता | अपने सेठू की आवाज उसी समय सुनकर शर्मा जी की मिसेज किचेन से ही इस अद्भुत दृश्य का नजारा ले रही थी |

 उनकी हंसी नहीं रुक पा रही थी | ठहाके लगते  वो शर्मा जी के
 पास गयी | अब क्या था ? शर्मा जी गुस्से से आग बबूला हुए बैठे थे | बस बरस पड़े धरमपत्नी पर | मैंने पहले ही कहा था कि ये कुत्ते - सुत्ते नहीं रखा करो घर में | आज तो जान को आफत ही आ पड़ी |  पता नहीं  लोगों को ये कुत्ते पालने का शौक कहाँ से आ जाता है | ऐसे ही दस पंद्रह मिनट बड़बड़ाते रहे शर्मा जी |

उनकी मिसेज  थोड़ी दूरी से अभी भी हलकी मुस्कान से शर्मा जी को बड़बड़ाते  हुए देखे जा रही थी |

--- जंग 

Saturday, 27 January 2018

कम्बल ! कोई तो हटा दो !

नींद पूरी हो चुकी है | टाइम देखने के लिए मेरा दाहिना हाथ अपने आप मोबाइल टटोलने लगा |
कम्बल के अंदर ही मोबाइल चेहरेके पास लाया | फिर बड़ी मुश्किल से एक आँख खोली और
मोबाइल स्क्रीन को देखा  | साढ़े आठ बज रहे थे | तुरंत होशियार मन ने बोला कि अभी तो साढ़े आठ
ही हो रहे और वैसे भी आज संडे है | फिर क्या था , खुला हुआ आँख बंद | फिर कम्बल एडजस्ट और
नींद के आगोश में | फिर कुछ देर बाद आँख खुली | अभी नौ बज गए | अब तो बस उठना ही था | इसलिए मैंने
यू ट्यूब पे मॉर्निगं सांग लगा दिया | दंगल और सुलतान के गाने चले | मैं अभी भी कम्बल में ही |
पैर, हाथ में एनर्जी आ गयी है | अब तो शरीर भी संगीत से हिलने लगा है | अब तो बस उठने ही वाला था मैं
कि अचानक गाना बंद | क्या हुआ ? अरे किसी का फ़ोन आया | मेरी इच्छा तो थी कि कम्बल से हाथ निकाल
कर फ़ोन उठया जाए मगर हिम्मत न हो पायी | अपने आप फ़ोन रिंग ओवर हो गया और यूट्यूब भी बंद |
अब न दंगल उठा पा रहा है मुझको, न ही सुल्तान | न हाथ कम्बल के बाहर
जाकर दुबारा क्लिक करने की कोशिश करना चाहता है |

अरे यार ये कम्बल ! कोई तो हटा दो !