Wednesday, 25 January 2017

२६ जनवरी

        आज २६ जनवरी है ।  मैं बहुत खुश हूँ । बगल के चाचा के दुकान से ऑडियो कैसेट के बजने की आवाज आ रही है ।" मेरे देश की धरती सोना उगले " यह गाना बज रहा है । पता नहीं क्यों पर मेरी बहन मुझे नही दिख रही है । आज वह मेरे लिए तिरंगा झंडा बनाने वाली थी । अरे उधर संजय अपने भैया से तिरंगा झंडा बनवा रहा है । मेरी बहन कहाँ  है ?मेरा झंडा कैसे बनेगा ? मैं बहुत खुश हूँ , उत्साहित हूँ पर परेशान भी हूँ । अब मुझे कुछ समझ नही आ रहा है । मैं दौड़कर अपने भैया की कॉपी उनके बस्ते से निकलने गया । कॉपी के बीचोबीच पिन से मैंने दो पेज निकले । उसको सीधा किया । चौकी पर रख कर पेंसिल से उसको तीन बराबर भागों में बाँट दिया । भैया के बस्ते  से लाल और हरे रंग  का स्केच पेन लाया । स्केच पेन के पीछे का ढक्कन खोल कर उसके अंदर के गद्दे से मैंने एक खाना रंग दिया । बीच वाला खाना छोड़ कर तीसरे को हरे रंग से रंग दिया । इसी तरह पन्ने को पलट कर  दूसरे तरफ भी रंग दिया ।
       झंडे को रंगने के बाद रसोंई की तरफ भागा । मैं रसोईं में रखे ईंधन में सबसे सीधा डंडा ढूँढ़ रहा था । माँ देख रही है किक्या चाहिए इसे ? सीधा डंडा लेकर मैं रसोईं से बाहर भागा । फिर अपने बनाये झंडे के पास आ गया । फिर अचानक याद आया कि झंडे को डंडे से चिपकाना है । मैं दौड़ कर माँ  के पास गया । माँ थोड़ा सा भात ( चावल ) दे दो , वो झंडा चिपकाना है । भात लेकर मैंने झंडा चिपकाया । अब मैंने डंडे को भी तीन रंग से रंग दिया । हाय ! कितना देर हो गया । झंडा सूख क्यों नही रहा है ? दौड़ कर संजय का बन रहा झंडा देखने चला गया । संजय अपना झंडा दौड़ दौड़ कर सबको दिखा रहा है । पर उसके झंडे का डंडा तो तीन रंग से नही रंगा है । मैं दौड़ कर अपने झंडे के पास गया । अब सूखे हुए झंडे को लेकर मैं संजय को दिखने आया । मेरे झंडे के डंडे को देख कर संजय भी अपने भैया के पास गया डंडे को तीन रंग से रंगवाने के लिए । अब मुझे अपने  डंडे, झंडे और अपने आप पर गर्व महसूस हो रहा था ।

      आज भी २६ जनवरी है । सुबह गाड़ियों की पों - पों से नींद खुली । आज ऑफिस की छुट्टी है ।  कम्बल हटा कर मैं उठा । शॉल ओढ़ कर बालकनी में गया । देखता हूँ कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं । हर बच्चे के हाथ में एक झंडा है । एक दूसरे को दिखा - दिखा कर ख़ुश हो रहे हैं । वही ख़ुशी , वही उत्साह , वही उमंग । बस फर्क इतना है कि हाथ के बने कागज़ की झंडियों की जगह बने - बनाये प्लास्टिक की झंडियों ने ले ली है ।

---- जंग बहादुर पटेल