|| नन्हा जीवन ||
बात करीब सात - आठ दिनो पहले की है । मैंने मटका आइसक्रीम
के छोटे मटके को धोकर साफ़ किया ,फिर उसे अपने रूम के बेड पर रख दिया । थोड़ी देर बाद मैंने मटके को उठाया और गुडगाँव जैसे व्यस्त
शहर के एक छोटी सी गली की तरफ चल दिया । थोड़ी देर चलने के बाद मैं गली में पहुँचा ।
दरअसल मैं उस मटके में नया पौध उगाने की सोच रहा था । इसके लिए मिटटी खोज रहा था । फेज ३ , यू ब्लॉक के गली संख्या १२ की बात है ।
गली में घुसते ही मैं सड़क के किनारों पर मिटटी खोज रहा था ।पौधे के लिए मिट्टी खोजना गुडगाँव जैसे शहर में मुश्किल काम था ,वर्ना गुडगाँव की सड़कों पर मिट्टी की कोई कमी नहीं है ,बात अलग है की वो धुल बनकर उड़ती रहती है। खैर जो भी हो , मैं आगे बढ़ता गया । चार -पाँच घरों के कंस्ट्रक्शन चल रहे थे ।
यहाँ उम्मीद थी । सब जगह निराशा ही हाथ लगी सिवाय एक के ।
मैंने देख लिया की लगभग दस कदम पर मिट्टी का ढेर है । मैं आइसक्रीम मटका छुपाते हुए मिट्टी के पास जाकर खड़ा हो गया । सोच रहा था की मिट्टी भरूं की नहीं । इसका कारण था कि एक बूढ़ा व्यक्ति मुझे ही देखे जा रहा था । मेरे हिसाब से वो व्यक्ति उस घर का गॉर्ड होगा । मेरी हिम्मत नहीं हुई की मिटटी की तरफ़ झुकूं । फिर कुछ सेकण्ड्स रुका और फिर आगे बढ़ गया ,डी एल ऍफ़ फेज ३ मेट्रो स्टेशन की ओर । ओवरब्रिज के निचे भी अच्छी मिटटी देख रहा था ,पर मिली नहीं ।
दिमाग में वही बूढ़ा था की कब हटेगा और मैं मिट्टी उठा लूंगा । पाँच मिनट इधर - उधर टहलने के बाद मैं फिर उसी जगह की ओर चल पड़ा । गेट से घुसते ही बूढ़ा व्यक्ति फिर दिख गया । मन ही मन सोचा कि अब मिटटी न मिल पायेगी ।
मैं जैसे ही मिट्टी के पास पहुंचा तो बूढ़ा फिर देखने लगा । मैंने कुछ नहीं सोचा और मटके को मिटटी की तरफ बढ़ा दिया और बैठ गया । गर्दन बिलकुल मटके से सटा दिया था । ठीक उसी तरह जैसे शुतुरमुर्ग । शुतुरमुर्ग की कहावत तो आपने सुनी होगी । दरअसल होता कुछ नहीं है , बस अपने को तसल्ली रहती है की मैं उसे देख नहीं रहा । तो थोड़ी देर के लिए ही सही पर थोड़ी हिम्मत ज़रूर आ जाती है , उस समय के हालात झेलने के लिए । और अपना काम हो जाता है । मैंने भी वही हिम्मत महसूस किया और धीरे - धीरे मिटटी भरने लगा ।
मिट्टी भरने के बाद मैंने बूढ़े व्यक्ति को कातर निगाहों से देखा । वो अब भी मुझे ही देख रहा था , पर कुछ आश्चर्य भरी निगाहों से । मैं अपने रूम पर आ गया । अपने फ्रेंड से कुछ चने के बीज मांगे, मिटटी के ऊपर रख कर थोड़ा पानी दे दिया । फिर उसे एक छोटे से गीले कपडे से ढक दिया । उसे उठाकर अपने किचन की खिड़की के पास रख दिया ,जहाँ शीशे से धूप छनकर आती है ।
उसे रख कर मैं भूल गया । दो दिन बाद मैं मैगी खाने के बाद बर्तन धुलने बेसिन के पास गया । बेसिन खिड़की के नीच ही था । तो अचानक क्या देखता हूँ कि जो गीला कपडा मैंने मटके को ढकने के लिए रख था ,उसे अब चार-पाँच नौजवान ,हट्टे-कट्टे , हरे-भरे मगर थोड़े पीले नए आगंतुकों ने अपने नन्हे - नन्हे हाथों से हवा में उठा रखा है । हाय ! कितने प्यारे लग रहे थे ये नए सदस्य । उन्हें देख कर अचानक से चमक आ गई आँखों में और दिल में । बड़ी ही अलग सी ख़ुशी हुई । ख़ुशी ऐसी की क्या कहूं ? बस ! मस्त वाला ।
मैंने संभालकर उस गीले कपडे को ,जो अब सुख चूका था , को पौधों के ऊपर से हटा दिया ।
उसके बाद मैं ऑफिस के लिए तैयार होने लगा । सोचा चने पौधों को धुप की जरुरत होगी , तो मटके सहित नवागन्तुकों को उठा कर मैंने बालकनी में रख दिया । फिरऑफिस के लिए निकल पड़ा ।
शाम को आकर क्या देखता हूँ की दो नवागंतुक गायब। मैं हैरान । आखिर हुआ क्या ? फिर एक नवागंतुक के बीज को थोड़ा करीब से देखा । उस पर चिड़िया के चोंच के निशान थे । बीज बस आधा बचा था । अब तीन आगंतुक बचे थे । दो तो चिड़िया को प्यारे हो गए । उन्हें रूम में लाकर रख दिया ।
अगले दिन धुप में इसलिए रख की कल गलती से कोई चिड़िया आ गई होगी , आज नहीं आएगी । आखिर धूप भी तो जरूरी था । पौधों के पास दो ही विकल्प थे । धुप में मतवाला बने या फिर चिड़िया का निवाला बने । मैंने उसे मतवाला होने के लिए छोड़ दिया । और फिर ऑफिस आ गया । शाम को पहुंचा तुरंत बालकनी का दरवाजा खोला और पहुँच गया पौधों के के पास ।
पता नहीं मेरे तीनो पौधे धुप में मतवाले हो भी पाये की नहीं , लेकिन चिड़िया का निवाला ज़रूर बन गए ।
अचानक मैं हंस पड़ा । इंसान दो ही टाइम हँसता है , एक तो जब वो खुश होता है ,दूसरा तब जब उसकी कटती है । खुश तो नहीं था मैं , तो जाहिर है की कटी । पर मुझसे भी ज्यादा एक और बेचारे की कटी । किसकी ? मटके की ।
बेचारा जैसा पहले था वैसे ही रह गया - सूखी मिट्टी के साथ ।
----' जंग '