Friday, 26 August 2016

॥ एग रोल ॥




डी एल एफ  फेज तीन की एक गली । फेज  तीन के मेट्रो  स्टेशन के बिलकुल  पास । शाम को ऑफिस  से आ रहा था ।  बहुत भूख लगी थी । एक दूकान पर कई लोग भीड़ लगा कर खड़े  थे । पास गया तो पता चला कि एग रोल के लिए सब खड़े हैं। मैंने भी एक एग रोल आर्डर कर दिया । उसके बाद सबकी तरह मैं भी  एग रोल  का इंतज़ार करने लगा । दरअसल बारह से पंद्रह लोग होंगे जो दो झुण्ड में एग रोल का इंतज़ार कर रहे  । काफी देर बाद मेरा नंबर आया । उसने पूछा पैक करना है क्या ? मैंने बोला -नही । फिर उसने रोल बना कर दे दिया । मैंने उसे पैसे दिए और रोल लेकर चल पड़ा । एक बाइट  लिया और पहुँच गया ,दूर अपने अतीत में । कि कैसे  स्कूल की छुट्टी होते ही हम सारे बच्चे बस्ता पीठ पर टाँगे हुए , हाथ में में मोटी पटरी घूमते हुए   पगडण्डी  पर दौड़ते । गेंहू  के खेतों  में छूपते , एक दुसरे को छूते  हुए बड़ी तेजी से ' हुर्री - हुर्री ' बोलते हुए ख़ुशी -ख़ुशी  घर जाते  थे । घर पहुँच कर मैंने दौड़ कर खूँटी पर बस्ता रखा  । फिर रसोईं घर में पहुँच गया । जहाँ माँ अभी खाना बना रही थी । माँ कढ़ाई  में तरी वाली आलू की सब्जी बना रही थी , जो की पंद्रह बीस मिनट बाद पकता । और साथ में रोटियां बेल रही थी । मैं घुस गया रसोईं  में और माँ से बोला । ' माई ! बहुत भूख़ लागी है । कुछ दो न ' । उसके बाद माँ ने कढ़ाई में कलछल डाला और तरी वाली सब्जी से सिर्फ आलू निकाला  और उसे रोटी पर रख दिया । फिर उसे फटाक से लपेटकर मुझे पकड़ा दिया । मैंने रोल की हुई रोटी पकड़ा और घर के बाहर चला गया । दूसरे  बच्चों के साथ खेलने के लिए । अचानक पीछे से कोई बाइक का हॉर्न बज रहा था । तो मैं वापस अपने आपको उस एग रोल वाली गली में पाता हूँ । हाथ में एग रोल अभी भी है । मैं सॉरी सॉरी बोल कर रास्ते से हटा । फिर एग रोल की एक और और बाईट ली ,और हल्की मुस्कान के साथ मैं आगे बढ़ गया ।


--जंग बहादुर पटेल 

Monday, 6 June 2016

नन्हा जीवन

|| नन्हा जीवन  ||

बात करीब सात - आठ दिनो पहले  की है । मैंने मटका आइसक्रीम
के छोटे मटके को धोकर  साफ़  किया ,फिर उसे अपने रूम  के बेड  पर रख दिया । थोड़ी देर बाद मैंने मटके को उठाया और गुडगाँव जैसे व्यस्त
 शहर के एक छोटी सी गली की तरफ चल दिया । थोड़ी देर चलने के बाद मैं गली में पहुँचा ।

दरअसल मैं उस मटके में नया पौध उगाने की सोच रहा था । इसके लिए मिटटी खोज रहा था । फेज ३ ,  यू ब्लॉक के गली संख्या १२  की बात है ।
गली में घुसते ही मैं सड़क के किनारों पर मिटटी खोज रहा था ।पौधे के लिए  मिट्टी  खोजना गुडगाँव  जैसे शहर में मुश्किल काम था ,वर्ना गुडगाँव की सड़कों पर मिट्टी  की कोई कमी  नहीं  है ,बात अलग है की वो धुल बनकर उड़ती रहती है। खैर जो भी हो , मैं आगे बढ़ता गया । चार -पाँच  घरों  के कंस्ट्रक्शन चल रहे थे ।
 यहाँ उम्मीद थी । सब जगह निराशा ही हाथ लगी सिवाय एक के ।

मैंने देख लिया की लगभग दस कदम पर मिट्टी का ढेर है । मैं आइसक्रीम  मटका छुपाते हुए मिट्टी के पास जाकर खड़ा हो गया । सोच रहा था की मिट्टी  भरूं की नहीं । इसका कारण था कि एक बूढ़ा व्यक्ति मुझे ही देखे जा रहा था । मेरे हिसाब से वो व्यक्ति उस घर का गॉर्ड होगा । मेरी हिम्मत  नहीं हुई की मिटटी की तरफ़ झुकूं । फिर कुछ सेकण्ड्स रुका और फिर आगे बढ़ गया ,डी एल ऍफ़ फेज ३ मेट्रो  स्टेशन  की ओर । ओवरब्रिज के निचे भी अच्छी मिटटी देख रहा था ,पर मिली नहीं ।


दिमाग में वही बूढ़ा था की कब हटेगा और मैं मिट्टी उठा लूंगा । पाँच मिनट इधर - उधर टहलने के बाद मैं फिर उसी जगह की ओर  चल  पड़ा । गेट  से घुसते ही बूढ़ा व्यक्ति फिर दिख गया । मन ही मन सोचा  कि अब मिटटी न  मिल पायेगी ।

मैं जैसे ही मिट्टी के पास पहुंचा तो बूढ़ा फिर देखने लगा । मैंने कुछ नहीं सोचा और मटके को मिटटी की तरफ बढ़ा दिया और बैठ गया । गर्दन बिलकुल मटके से सटा दिया था । ठीक उसी तरह जैसे शुतुरमुर्ग । शुतुरमुर्ग की कहावत तो आपने सुनी होगी । दरअसल होता कुछ नहीं है , बस अपने को तसल्ली रहती है की मैं उसे देख नहीं रहा । तो थोड़ी देर के लिए ही सही पर थोड़ी हिम्मत ज़रूर आ जाती है , उस समय के हालात  झेलने के लिए । और अपना काम हो जाता है । मैंने भी वही हिम्मत महसूस किया और धीरे - धीरे मिटटी भरने लगा । 

मिट्टी  भरने के बाद मैंने बूढ़े व्यक्ति को कातर निगाहों से देखा । वो अब भी मुझे ही देख रहा था , पर कुछ आश्चर्य भरी निगाहों से ।  मैं अपने रूम पर आ गया । अपने फ्रेंड से कुछ चने के बीज मांगे,  मिटटी के ऊपर रख कर थोड़ा पानी दे दिया । फिर उसे एक छोटे से गीले कपडे से ढक दिया  । उसे उठाकर अपने किचन की खिड़की के पास रख दिया ,जहाँ  शीशे  से धूप छनकर आती है ।

उसे रख कर मैं भूल गया । दो दिन बाद मैं मैगी खाने के बाद बर्तन धुलने बेसिन के पास गया ।  बेसिन खिड़की के नीच ही था । तो  अचानक क्या देखता हूँ कि जो गीला कपडा मैंने  मटके को ढकने  के लिए रख था ,उसे अब चार-पाँच  नौजवान ,हट्टे-कट्टे  , हरे-भरे मगर थोड़े पीले नए आगंतुकों ने अपने नन्हे - नन्हे हाथों से हवा में उठा रखा  है । हाय ! कितने प्यारे लग रहे थे ये नए सदस्य । उन्हें देख कर अचानक से चमक आ गई आँखों में और  दिल में । बड़ी ही अलग सी ख़ुशी हुई । ख़ुशी ऐसी की क्या कहूं ? बस ! मस्त वाला ।

मैंने संभालकर उस गीले कपडे को ,जो अब सुख चूका था , को पौधों के ऊपर से हटा दिया ।


 उसके बाद मैं ऑफिस के लिए तैयार होने लगा । सोचा चने पौधों को धुप की जरुरत होगी , तो मटके सहित नवागन्तुकों को उठा कर  मैंने बालकनी में रख दिया । फिरऑफिस के लिए निकल पड़ा ।

शाम को आकर क्या देखता हूँ की दो नवागंतुक गायब।  मैं हैरान । आखिर हुआ क्या ? फिर एक नवागंतुक के  बीज को थोड़ा करीब से देखा । उस पर चिड़िया के चोंच  के निशान  थे । बीज बस आधा बचा था । अब तीन आगंतुक बचे थे । दो तो चिड़िया को प्यारे हो गए । उन्हें रूम में लाकर रख दिया ।

अगले दिन धुप में इसलिए रख की कल गलती से कोई चिड़िया आ गई होगी , आज नहीं आएगी । आखिर धूप  भी तो जरूरी था । पौधों के पास दो ही विकल्प थे । धुप में मतवाला बने या फिर चिड़िया का निवाला बने । मैंने उसे मतवाला होने के लिए छोड़ दिया । और  फिर ऑफिस आ गया । शाम को पहुंचा तुरंत बालकनी का दरवाजा खोला और पहुँच गया पौधों के के पास ।

पता नहीं मेरे तीनो पौधे धुप में मतवाले हो भी पाये की नहीं , लेकिन चिड़िया का निवाला ज़रूर बन गए ।

अचानक मैं हंस पड़ा । इंसान दो ही टाइम हँसता  है , एक तो जब वो खुश होता है ,दूसरा तब जब उसकी कटती है । खुश तो नहीं था मैं , तो जाहिर है की कटी । पर मुझसे भी ज्यादा एक और बेचारे की कटी । किसकी ? मटके  की ।

बेचारा जैसा पहले था वैसे ही रह गया - सूखी मिट्टी के साथ ।

----' जंग '

Monday, 2 May 2016

बाबा रामदेव की एक झलक

रैपिड मेट्रो से उतर कर मेरे पैर सिकन्दरपुर - फरीदाबाद टोल रोड की तरफ बढ़ रहे थे ,शेयरिंग कैब पकड़ने के लिए | जैसे ही पहुंचा तो क्या देखता हूँ की एक कैब अभी अभी सवारियों से भर के चल पड़ी | थोड़ा निराश हुआ क्योंकि सामान्यत: पंद्रह मिनट लग जाते हैं दूसरी कैब को भरने में और किस्मत खराब हुई तो आधे घंटे भी | लेकिन आज सौभाग्य से बस ५ मिनट में कैब भर गई | शेयरिंग कैब चल पड़ी ग्वाल पहाड़ी की ओर | पीछे वाली दो सीट पर हम चार बन्दे बैठे थे | हम एक मिनट चले ही थे की मेरे बगल में बैठे बन्दे नेचिल्लाया "अबे ! बाबा रामदेव " | मैं सामने ड्राइवर के शीशे से आगे की तरफ देख रहा था | मैंने बड़ी तेजी से पीछे की तरफ देखा | तब तक गाडी हमारे बगल में आ चुकी थी और हमें ओवरटेक कर रही थी | मुझे कुछ भगवा रंग का कपडा दिखा | बाबा रामदेव ठीक से दिखे नहीं | हमारे शेयरिंग कैब में अब पतंजलि की बातें होने लगी | हमारी नज़र उस स्कार्पियो पे थी जिसमे बाबा रामदेव बैठे थे | उसके आगे पीछे दो मिलिट्री जवानों से जिप्सी | आगे डी एल एफ फेज १ का रेड लाइट आया | वहाँ जाकर गाडी रुकी | हमारी गाडी पीछे वाली मिलिट्री गाडी के पीछे थी | मैं स्कार्पियो के लेफ्ट फ्रंट साइड मिरर में रामदेव को देखने की कोशिश कर रहा था ,पर निराशा ही हाथ लगी | रेड लाइट के ग्रीन होते ही सारी गाड़िया चल पड़ी | हम सबमे बातें हो रही थी की अगले रेड लाइट पर बाबा रामदेव की गाड़ी नहीं रुकेगी | पर जैसे ही रेड लाइट के पास पहुंचे तो किस्मत से लाइट ग्रीन हो गई और स्कार्पियो आगे की ओर बढ़ गई | पर हम क्या देखते हैं रेड लाइट क्रॉस करते ही स्कार्पियो सड़क के साइड हो गई और रुक गई | आगे और पीछे वाली मिलिट्री गाड़ियों से जवान उतरते हैं | अब तक हम स्कार्पियो को क्रॉस कर चुके थे | और देखते हैं की स्कार्पियो बिना सिक्योरिटी के हमारे पीछे आ रही थी | मैं पीछे की तरफ स्कार्पियो में बाबा रामदेव को सीधे देख रहा था | क्या शान से ड्राइवर के बगल वाली सीट पर विराजमान थे | हमने हाथ हिलाने की कोशिश की पर कहा ही दिखता हमारा हाथ स्कार्पियो में बैठे बाबा रामदेव को | और थोड़े ही देर में स्कार्पियो फिर से हमें ओवरटेक कर गई | आगे जाकर सड़क के किनारे खड़ी जवानों से भरी जिप्सी स्कार्पियो के आगे लग गई |और पीछे से एक जिप्सी आकर फॉलो करती है | और फिर हम उसके पीछे - पीछे | ग्वाल पहाड़ी चौकी तक यह सिलसिला चलता रहा और हमारी गाड़ी बाएं मुड़ जाती है और स्कार्पियो सीधे निकल गई फरीदाबाद की ओर | इस तरह बैठे बिठाये बाबा रामदेव के दर्शन हो गए |
----जंगबहादुर पटेल

Monday, 18 April 2016

बोरिंग जिंदगी में आनंद

आज सुबह से ही सोच रहा था की ऑफिस जाऊं की नहीं | फिर फाइनली मैंने डिसाइड किया कि चलो ऑफिस चलेंगे लेकिन लेट | मैं और मेरा दोस्त  'Anil' साढ़े नौ बजे के आस पास मालवीय नगर से मेट्रो पकड़ते हैं और चल पड़ते हैं , अपने ऑफिस कि ओर | ऑफिस कि ओर बोल तो दिया , मगर असल में हम उस जिंदगी कि ओर जा रहे थे , जिसमें न तो कोई उमंग है , न कोई उम्मीद | वही घिसी पिटी जिंदगी | मेट्रो से उतरकर हम एक शेयरिंग कैब लेते हैं सिकन्दरपुर से | कैब में तीन कि सीट पर चार एडजस्ट कर के बैठे | और ग्यारह लोगो से ठसाठस भरी वैन अब चल पड़ी ग्वाल पहाड़ी |  वैन कि विंडो ओपन थी और मैं विंडो के पास | चारों तरफ ऊँची -ऊँची  बिल्डिंग्स से घिरी , और बीच में दूर तक फैली  हरी- हरी बबूल कि झाड़ियाँ | और इन झाड़ियों के बीच से होकर गुजरती ग्वाल पहाड़ी कि सुन्दर , सर्पाकार  सड़क |  उस वैन में आज मेरे लिए हर रोज से कुछ डिफरेंट था | हरयाणवी और पंजाबी से डिफरेंट आज मधुर आवाज में सन् ६० का कोई पुराना गीत बज रहा था | हलकी हलकी हवा के साथ ये गीत मन को और मधुर करता जा रहा था | रोज कि घिसी पिटी जिंदगी से जूझने कि हिम्मत तो नहीं कह सकता , पर थोड़ी देर के लिए इस जिंदगी में आनंद  जरूर भर गई |


-- 'जंग'