Sunday, 28 January 2018

शर्मा जी

धत्त... | दुर्र... | दुर्र... | शर्मा जी हाथ में लिए अख़बार से उनकी कुर्सी के बगल में बैठे कुत्ते को अपने से दूर कर रहे थे |एक दो बार ऐसा करने पर भी सेठू अपनी जगह से हिला नहीं | सेठू उनकी धर्मपत्नी का राजदुलारा, प्यारा,
आँखों का तारा, जो भी कह लो,  था | सेठू के प्रति उनका प्यार का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं
कि शर्मा जी से भी  पहले भोजन उनके राजदुलारे सेठू को ही मिलता था | ये बात हो या कुछ और भी |
लेकिन शर्मा जी को सेठू और उसके पूरी जाति से नफ़रत थी | नफरत कह लो या डर | यहाँ एक ही बात थी |

अबकी बार शर्मा जी ने उसे भगाने के लिए अपने पैरों का इस्तेमाल किया |  इस बार सेठू को आ गया गुस्सा | उसने पैर को अपनी तरफ आते देख जोर से भोंकना चालू कर दिया | और काटने को दौड़ पड़ा | अब शर्मा जी के डर का चमत्कार देखिये कि शर्मा जी कुर्सी  से गिरे और जिस तेजी से उठ कर घर के अंदर कि ओर भागे , कि बस मत पूछो | अख़बार कब सीढ़ियों पर गिरा ? शर्मा जी कब घर में बिस्तर पर आ गये , खुद शर्मा जी को भी नहीं पता | अपने सेठू की आवाज उसी समय सुनकर शर्मा जी की मिसेज किचेन से ही इस अद्भुत दृश्य का नजारा ले रही थी |

 उनकी हंसी नहीं रुक पा रही थी | ठहाके लगते  वो शर्मा जी के
 पास गयी | अब क्या था ? शर्मा जी गुस्से से आग बबूला हुए बैठे थे | बस बरस पड़े धरमपत्नी पर | मैंने पहले ही कहा था कि ये कुत्ते - सुत्ते नहीं रखा करो घर में | आज तो जान को आफत ही आ पड़ी |  पता नहीं  लोगों को ये कुत्ते पालने का शौक कहाँ से आ जाता है | ऐसे ही दस पंद्रह मिनट बड़बड़ाते रहे शर्मा जी |

उनकी मिसेज  थोड़ी दूरी से अभी भी हलकी मुस्कान से शर्मा जी को बड़बड़ाते  हुए देखे जा रही थी |

--- जंग 

Saturday, 27 January 2018

कम्बल ! कोई तो हटा दो !

नींद पूरी हो चुकी है | टाइम देखने के लिए मेरा दाहिना हाथ अपने आप मोबाइल टटोलने लगा |
कम्बल के अंदर ही मोबाइल चेहरेके पास लाया | फिर बड़ी मुश्किल से एक आँख खोली और
मोबाइल स्क्रीन को देखा  | साढ़े आठ बज रहे थे | तुरंत होशियार मन ने बोला कि अभी तो साढ़े आठ
ही हो रहे और वैसे भी आज संडे है | फिर क्या था , खुला हुआ आँख बंद | फिर कम्बल एडजस्ट और
नींद के आगोश में | फिर कुछ देर बाद आँख खुली | अभी नौ बज गए | अब तो बस उठना ही था | इसलिए मैंने
यू ट्यूब पे मॉर्निगं सांग लगा दिया | दंगल और सुलतान के गाने चले | मैं अभी भी कम्बल में ही |
पैर, हाथ में एनर्जी आ गयी है | अब तो शरीर भी संगीत से हिलने लगा है | अब तो बस उठने ही वाला था मैं
कि अचानक गाना बंद | क्या हुआ ? अरे किसी का फ़ोन आया | मेरी इच्छा तो थी कि कम्बल से हाथ निकाल
कर फ़ोन उठया जाए मगर हिम्मत न हो पायी | अपने आप फ़ोन रिंग ओवर हो गया और यूट्यूब भी बंद |
अब न दंगल उठा पा रहा है मुझको, न ही सुल्तान | न हाथ कम्बल के बाहर
जाकर दुबारा क्लिक करने की कोशिश करना चाहता है |

अरे यार ये कम्बल ! कोई तो हटा दो !