धत्त... | दुर्र... | दुर्र... | शर्मा जी हाथ में लिए अख़बार से उनकी कुर्सी के बगल में बैठे कुत्ते को अपने से दूर कर रहे थे |एक दो बार ऐसा करने पर भी सेठू अपनी जगह से हिला नहीं | सेठू उनकी धर्मपत्नी का राजदुलारा, प्यारा,
आँखों का तारा, जो भी कह लो, था | सेठू के प्रति उनका प्यार का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं
कि शर्मा जी से भी पहले भोजन उनके राजदुलारे सेठू को ही मिलता था | ये बात हो या कुछ और भी |
लेकिन शर्मा जी को सेठू और उसके पूरी जाति से नफ़रत थी | नफरत कह लो या डर | यहाँ एक ही बात थी |
अबकी बार शर्मा जी ने उसे भगाने के लिए अपने पैरों का इस्तेमाल किया | इस बार सेठू को आ गया गुस्सा | उसने पैर को अपनी तरफ आते देख जोर से भोंकना चालू कर दिया | और काटने को दौड़ पड़ा | अब शर्मा जी के डर का चमत्कार देखिये कि शर्मा जी कुर्सी से गिरे और जिस तेजी से उठ कर घर के अंदर कि ओर भागे , कि बस मत पूछो | अख़बार कब सीढ़ियों पर गिरा ? शर्मा जी कब घर में बिस्तर पर आ गये , खुद शर्मा जी को भी नहीं पता | अपने सेठू की आवाज उसी समय सुनकर शर्मा जी की मिसेज किचेन से ही इस अद्भुत दृश्य का नजारा ले रही थी |
उनकी हंसी नहीं रुक पा रही थी | ठहाके लगते वो शर्मा जी के
पास गयी | अब क्या था ? शर्मा जी गुस्से से आग बबूला हुए बैठे थे | बस बरस पड़े धरमपत्नी पर | मैंने पहले ही कहा था कि ये कुत्ते - सुत्ते नहीं रखा करो घर में | आज तो जान को आफत ही आ पड़ी | पता नहीं लोगों को ये कुत्ते पालने का शौक कहाँ से आ जाता है | ऐसे ही दस पंद्रह मिनट बड़बड़ाते रहे शर्मा जी |
उनकी मिसेज थोड़ी दूरी से अभी भी हलकी मुस्कान से शर्मा जी को बड़बड़ाते हुए देखे जा रही थी |
--- जंग
आँखों का तारा, जो भी कह लो, था | सेठू के प्रति उनका प्यार का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं
कि शर्मा जी से भी पहले भोजन उनके राजदुलारे सेठू को ही मिलता था | ये बात हो या कुछ और भी |
लेकिन शर्मा जी को सेठू और उसके पूरी जाति से नफ़रत थी | नफरत कह लो या डर | यहाँ एक ही बात थी |
अबकी बार शर्मा जी ने उसे भगाने के लिए अपने पैरों का इस्तेमाल किया | इस बार सेठू को आ गया गुस्सा | उसने पैर को अपनी तरफ आते देख जोर से भोंकना चालू कर दिया | और काटने को दौड़ पड़ा | अब शर्मा जी के डर का चमत्कार देखिये कि शर्मा जी कुर्सी से गिरे और जिस तेजी से उठ कर घर के अंदर कि ओर भागे , कि बस मत पूछो | अख़बार कब सीढ़ियों पर गिरा ? शर्मा जी कब घर में बिस्तर पर आ गये , खुद शर्मा जी को भी नहीं पता | अपने सेठू की आवाज उसी समय सुनकर शर्मा जी की मिसेज किचेन से ही इस अद्भुत दृश्य का नजारा ले रही थी |
उनकी हंसी नहीं रुक पा रही थी | ठहाके लगते वो शर्मा जी के
पास गयी | अब क्या था ? शर्मा जी गुस्से से आग बबूला हुए बैठे थे | बस बरस पड़े धरमपत्नी पर | मैंने पहले ही कहा था कि ये कुत्ते - सुत्ते नहीं रखा करो घर में | आज तो जान को आफत ही आ पड़ी | पता नहीं लोगों को ये कुत्ते पालने का शौक कहाँ से आ जाता है | ऐसे ही दस पंद्रह मिनट बड़बड़ाते रहे शर्मा जी |
उनकी मिसेज थोड़ी दूरी से अभी भी हलकी मुस्कान से शर्मा जी को बड़बड़ाते हुए देखे जा रही थी |
--- जंग