"तुमने मेरे लिए किया ही क्या है ?" अपने दोस्तों के द्वारा अचानक पूछे गए इस प्रश्न ने मुझे सोच में डाल दिया |
इसे दोस्तों का प्यार कह लो या मेरा भावुक वयक्तित्व | यह प्रश्न सुन के वैसे मैं रुआँसा सा हो गया था | आँखे अचानक नम हो गयी थी | मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूँ ?
पर दिमाग पर जोर डाल के भी देखा | मेरे पास कोई उत्तर भी नहीं था |
इसका एक कारण तो यह था कि मैंने कभी यह प्रश्न एक्सपेक्ट ही नहीं किया था
या कभी मुझे इसका खयाल आया ही नहीं कि ऐसा भी प्रश्न मुझसे पूछा जा सकता है |
वैसे मुझे पता है कि सभी किसी न किसी मतलब से ही एक दुसरे के साथ रहते हैं |
किसी को आर्थिक सहयोग चाहिए, किसी को नैतिक, किसी को मानसिक, किसी को भौतिक, तो किसी को शारीरिक |
यहां पर शायद मुझे 'मतलब' शब्द नहीं प्रयोग करना चाहिए |
सबमे अगर दूर तक देखें तो कोई न कोई स्वार्थ निहीत होता है |
मुझे भी दोस्तों ने आर्थिक सहयोग दिया था, वो भी संकट के स्थिति में | मैं यह कभी भूल भी नहीं सकता | बाकी उनके साथ घूम फिर के मन को अच्छा लगता है |
तो कह सकते हैं कि मानसिक सहयोग भी करते हैं |
अब इसे मेरा स्वार्थ भी कह सकते हो क्योंकि मैं उनके साथ इसलिए घूमता हूँ क्योंकि मुझे अच्छा लगता है |
पर मैं भी मानसिक रूप से तैयार था कि अगर उन्हें भी कोई आर्थिक सहायता की ज़रूरत होगी ,
तो मैं भी सपोर्ट करूँगा, सहारा दूंगा |
अब जो भी कह लो, इसे प्रभु की कृपा कह लो या उनका मैनेजमेंट कह लो ,
उन्हें कभी मुझसे पैसे मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ी | तो मैंने कभी उन्हें आर्थिक सहयोग तो निश्चय ही नहीं दिया |
हाँ यह ज़रूर है कि अगर सहयोग मांगेंगे तो हमेशा मदद के लिए साथ खड़ा रहूँगा |
मैं अभी तक दोस्ती को यही समझ रहा था कि साथ में दारु पीना, खाना खाना, नाचना - गाना | साथ में कहीं टूर पे जाना |
निस्वार्थ साथ रहना | इन्ही सबसे दोस्ती में मजबूती आती है| पर मैं गलत था |
दोस्तों के लिए भी कुछ कर के रखो|
बस शादी में साथ जाने , दिल साफ़ रखने से, दुआएं करने से कोई अच्छा दोस्त नहीं बनता |
जैसे प्यार बस करने से नहीं होता , जताना पड़ता है,
उसी तरह दोस्ती भी जता दिया करो |
मैं तो बहुत रोया था | तुम बच जाओगे |
बाद में कभी शिकायत नहीं करना कि मैंने आगाह नहीं किया था|
दरअसल यह प्रश्न ऐसे ही नहीं आ गया हवा में उड़ते - उड़ते |
बात यह थी कि हममें से एक को चिकन खाना था | हम वेज - नॉनवेज को लेकर बहस हो गयी | मुझे वेज खाना था |
उसको नॉनवेज | न मैं तैयार हो रहा था कि चलो नॉन-वेज वाले की बात मानी जाए , न ही वो वेज खाने को तैयार था | एक वेज ढाबे पे बैठ कर हम यह शरारत कर रहे थे | बाद में बहस होनी शुरू हो गयी | मुझे सर्रेंडर करना पड़ा , क्योंकि तीन बन्दे तैयार हो गए थे, चिकेन खाने वाले दोस्त की तरफ और मैं अकेला रह गया |
हम दूसरे ढाबे पर गए | उन्होंने गाडी रोकी | चिकेन का पूछा | यह एक वेज ढाबा था | पता नहीं, पर वो इस वेज ढाबे पर उतर गए | मुझे अब गुस्सा आ गया कि जब वेज ढाबे पे ही खाना था तो मुझसे चिकन खाने की इतनी जिद क्यों की| वेज तो हम पिछले ढाबे पे भी खा सकते थे | मैं कुछ देर फालतू में इसी बात को लेकर चिल्लाता रहा, क्योंकि मेरी बात सुनी नहीं गयी |
आर्डर किया गया और खाना आया | बहस अभी भी जारी थी | बात कोम्प्रोमाईज़ की आ गयी की मैं कोम्प्रोमाईज़ नहीं करता एक दोस्त के लिए | उसे चिकन खाना है तो ढाबे पे खा लेते हैं, इसमें मेरा क्या जाता है |
मैंने बोला कि यही बात तो इस्पे भी लागू होती है | मैंने अपने चिकन खाने वाले दोस्त की तरफ इशारा कर के कहा |
लेकिन मैं चाँप दिया गया |
"तू ट्रिप के लायक नहीं है | तुझे कोम्प्रोमाईज़ नहीं करना आता | दस बन्दों की ट्रिप में कोम्प्रोमाईज़ करना पड़ता है नहीं तो ट्रिप ख़राब कर देगा तू | " मेरे एक दोस्त ने कहा |
"मैंने ऐसे लोगों के साथ जाऊंगा ही नहीं | मैं बस अपने दोस्तों के साथ जाऊंगा | जो मेरे जैसे हैं | ताकि कोम्प्रोमाईज़ न करना पड़े | " तो मेरे उस मित्र ने एक सलाह दिया कि तू सोच ही गलत रहा है | सबको अपने मन की करने दो | तुम अपने मन की करो |
अब मैं चुप रहा |
मेरे मन में तो यह भी आ रहा था कि सबके मन की करने लगे तो हो चूका ट्रिप |
किसी को जंगल घूमना है , किसी को झरना देखना तो किसी को कुछ | मैंने कोम्प्रोमाईज़ ही तो किया हैं इन सारे ट्रिप में |
मेरे मन की तो कभी नहीं की किसी ने |
मुझे पता लग गया था कि अब मेरी नहीं सुनी जाएगी |
फिर अंतर्मन से एक आवाज आयी - "तुम्हारी कोई क्यों सुने ?"
मैं अनतर्मन को कोई सटीक जवाब दे नहीं पाया हूँ अभी तक |
खैर इसी कोम्प्रोमाईज़ को लेकर ही मेरे को वह प्रश्न पूछ दिया गया जो मैंने कभी सोचा ही नहीं था |
अब आप भी पूछना अपने आपसे |
और इस प्रश्न के जवाब के साथ रहें जब आपका दोस्त गलती से ही सही , कभी पूछ बैठे कि -
"तुमने हमारे लिए किया ही क्या है?"
--जंग