Wednesday, 24 June 2020

सहमी सी आंखें

उन सहमी सी आंखों में मेरी नज़र यूँ ही नहीं पड़ी? ब्लू - मजेंटा सलवार सूट में वो धीरे धीरे चौराहे की एक सड़क पर आगे को बढ़ रही थी। गर्दन का स्टॉल एडजस्ट करते हुए।

मुझे उसकी स्थिति को भांपने में ज़रा भी समय नहीं लगा।
उस स्थिति से बचाने के लिए मैंने फल वाले को जल्दी जल्दी पैसे दिए। एक हल्की सी मुस्कान के साथ उस लड़की को देखा। फिर उसके पीछे खड़े कुछ आदमियों को। इंतज़ार था तो सिर्फ उसके नज़र मिलाने का। 

उसने भी देखा और हल्की सी मुस्काई। वजह शायद मेरा ड्रेसिंग हो सकता है। एक काली टीशर्ट जिसपे जगह जगह बहुत छोटे छोटे कैनेडा फ्लैग वाले पत्ते छपे हुए हैं...सफेद रंग में, लाइट ग्रे पैंट, भूरे रंग के लेदर शूज। आंखों पर लेंस वाला चश्मा जो कि न चाहते हुए भी आपको सॉफ्टवेयर इंजीनियर वाला लुक दे देते हैं। वहाँ दूर कोटा जैसे गाँव में मैं बिल्कुल डिसेंट लग रहा था।

उसने हाथों के इशारों से 'हाय' कहा और आगे को बढ़ गयी।
मैंने भी हल्की सी मुस्कान भर दी।

"लगता है उसका मजनू आ गया" पीछे खड़े चार बेहद फूहड़ आदमियों में से एक ने कहा और फिर उसके सारे साथी दाँत निपोर कर हँसने लगे।

"जी तो करता है इनका मुँह फोड़ दूँ!... जाहिल!... गँवार!...। एक पैसे का सेंस नहीं है। रोज़ की आदत है।.... लड़की देखी नहीं की कमैंट्स शुरू।.... उमर भी नहीं देखते अपना।.... छि! मेरा तो मुँह भी खराब हो जाए इनकी बातें करने में।..... मेरा बस चले तो ये चाय की दुकान के साथ साथ इनको भी पी जाऊँ। घटिया लोग!"

बिना रुके उसने न जाने क्या क्या कह दिया। अभी सड़क पर सहम के चलने वाली लड़की को इतने कॉन्फिडेंस से बात करते सुन के आश्चर्य हो रहा था...।

"लोकल हैं नहीं तो बताती इनको.... ज़ाहिल कहीं के" वो अपनी भड़ास निकालने में बिजी थी।

"फ़िर जुबान भी खराब हो जाएगा" मैंने हंसते हुए कहा।
"क्या?"
"अरे! उनके बारे में बात करने से मुँह खराब हो रहा तो ...उन्हें दुकान के साथ पीने से जुबान ख़राब हो जाएगी।" 

उसने कुछ कहा नहीं, बस मुस्करा दिया। 

मुझे लगा कि मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है। 

मैंने हाथों के इशारे से पूछा कि किधर चलना है.... उसने भी हाथों से इशारा कर दिया।

हम चलने लगे उसके घर की तरफ। एक जेंटलमैन की तरह मैंने उसे सड़क से दूर रखा और ख़ुद सड़क वाली साइड पे आ गया। 

'उम्म...आप यहाँ क्या करती हैं?"
"मैं शिक्षक हूँ। यहाँ से कोई दस बारह किलोमीटर दूर मेरा विद्यालय है।"
"अच्छा! मेरी बहन भी शिक्षक है... अभी उसे ही उसके रूम पर छोड़ के आया। "

"अच्छा अच्छा! कहाँ पे पोस्टिंग है?"

"मुझे गाँव का नाम तो नहीं पता... एक्चुअली मुझे कुछ भी पता नहीं यहाँ का। पहली बार आया इधर, सोनभद्र।"
मैंने पास से गुज़र रहे एक ऑटो से थोड़ा बचते हुए कहा। 

"पर इधर ही रहती है...यहीं"  मैंने हाथ से इशारा कर दिया।

"अच्छा अच्छा।" उसने समझ लिया कि मैं बिल्कुल अनाड़ी हूँ इधर। 

"पहली बार ? तो कैसा लगा सोनभद्र?" आंखों में थोड़ी चमक के साथ उसने पूछा।

"आप तो ऐसे बोल रही जैसे आप यहीं की हो?"

"हाँ! हम सोनभद्र के ही हैं। शक्तिनगर में हमारा घर है।" बहुत ही गर्व के साथ उसने अपना परिचय दिया।

"कभी सुना नहीं"
"कोई नहीं... आप इधर के हो नहीं न? यहाँ के सब लोगों को पता है"
"और आप?"
"बनारस"
"अच्छा अच्छा।" उसने सिर हिलाया और हम मेन सड़क छोड़ कर एक पतली सड़क की तरफ मुड़ गए।
 "और आप....?
'हाँ?' उसके बिना प्रश्न पूरा हुए ही मैं बीच में टपक पड़ा।

"....आप क्या करते हैं?" उसने पूछा। 

"कंप्यूटर का छोटा मोटा काम रहता है।" पता नहीं software इंजीनियर को जनती होगी या नहीं... सो आने वाले सारे प्रश्नों से बचने के लिए मैंने ऐसे बता दिया। वैसे भी मेरे गाँव में जब कोई पूछता है तो मैं यही जवाब देता हूँ।

"अच्छा!"

चलते चलते हम उनके कमरे के पास पहुँच गए।

"ये आ गया हमारा रूम" उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।
"चलिये फिर, मैं चलता हूँ।"
"चाय?"
"फ़िर कभी" मैंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ मना कर दिया।

"थैंक यू!" जैसे ही मैं पीछे मुड़ रहा था चलने के लिए, उसने एक धीमी आवाज़ में कहा।

"मैंने कुछ नहीं किया! हाँ! बच्चों को पढ़ाइये और कोशिश करिये की वहाँ सड़क पे आपका कोई स्टूडेंट न हो।" मैंने उन तानाकशी वाले फूहड़ आदमियों की तरफ इशारा करते हुए कहा।


"ज़रूर!" अब उसके चेहरे पे हँसी बिखर चुकी थी।
"आपसे बात करके अच्छा लगा"  
"मुझे भी"  हल्की सी हसीं के साथ उसने कहा।

"चलते हैं" मैंने एक मुस्कान के साथ अलविदा किया और आगे की ओर चल दिया।

अनजान जगह पर लड़की के साथ चल तो दिया था पर मेरी भी फट चुकी थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
रास्ता मैं भटक चुका था। बातों बातों में ध्यान ही नहीं रहा कि कब किधर कहाँ से मुड़ा था।

मैंने बहन को कॉल किया। उसको व्हाट्सएप्प लोकेशन शेयर किया और फिर गूगल की जगह उसके इंस्ट्रक्शन्स फॉलो करते करते हुए उसके कमरे पर पहुंच गया।

अभी घर को लौट रहा हूँ।

मुझे मन ही मन चिंता होने लगी.... मेरे बहन की और उन सारी लड़कियों की जो ऐसे दूर दराज गाँवों में शिक्षण का काम कर रही हैं और ऐसी स्थिति उनके दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी है।

(समाप्त)

--जंग


Monday, 22 June 2020

मंगेतर


पैसे की तो कोई कमी नहीं थी। लाख रुपये महीने की सैलरी। किसी भी shopping मॉल में जाता तो सोचना नहीं पड़ता था की पसंद आयी चीज़ को खरीदूं कि नहीं।

नीरज गुड़गांव के एक MNC में software इंजीनियर था।
शादी की उम्र हो रही थी। वो अब छब्बीस बरस का हो चला था। उत्तराखंड में उसका ख़ुद का दो मंजिला मकान था। घरवालों ने एक लड़की देखी थी उसके लिए.... सुंदर, सुशील...। नीरज को भी लड़की पसंद आयी.... और लड़की को नीरज। फिर क्या था?.... दोनों परिवारों ने मिलकर रिश्ता पक्का कर दिया। रोका हो गया। परन्तु नीरज के कुंडली में दोष की वजह से शादी को दो साल बाद करने का फैसला लिया गया।

इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि लड़का जॉब कर रहा था... और शगुन अपनी बैचलर की पढ़ाई कर रही थी। दोनों को काफी समय मिल गया एक दूसरे को जानने का। उनके बीच एक नया रिश्ता , नया प्यार पनपने लगा। अपनी मंगेतर...शगुन...से office से आने के बाद वो हमेशा उससे फ़ोन पे बातें करता था। कभी कभी weekend पर दोनों प्लान करने थे तो नीरज gurgaon से रात को बस पकड़ कर मिलने चला जाता था...उत्तराखंड। ये बात परिवारों को पता नहीं थी। वैसे पता भी होता तो कोई समस्या थी नहीं।

ऐसे ही कई साल तक वो उससे बातें करता था...जब भी शगुन exams को लेकर disturb होती थी तो नीरज उसे सुलझाता था..... समझाता था। उसके हिम्मत हार जाने पर उसे प्रोत्साहित करता था... ताकि वो फिर से नई ऊर्जा के साथ लक्ष्य के लिए लड़े...पढ़े।

शगुन की मेहनत रंग लायी। सरकारी नौकरी लग गयी उसकी। एक बैंक में ब्रांच मैनेजर के पद पे। शगुन की सरकारी नौकरी लगने पर सबसे ज्यादा कोई ख़ुश था तो वो यही। शगुन ने नौकरी join किया। बातों का सिलसिला फिर भी चलता रहा। धीरे धीरे दो साल बीतने को आये और पहले से ही तय शादी का साल आ गया।

शगुन के घरवालों को अब नीरज में कोई खास दिलचस्पी थी नहीं....। क्योंकि अब उनकी लड़की की नौकरी सरकारी थी...तो उन्हें दामाद भी सरकारी चाहने लगा। वो इस बात का जिक्र शगुन से करने लगे। उन्होंने शगुन को समझाया कि सरकारी लड़का उसके लिये अच्छा है।
और ताज़्जुब की बात तो देखो ...कि वो मान भी गयी ... बड़ी आसानी से। धीरे धीरे शगुन को भी लगने लगा कि अब तो उसकी जॉब लग गयी है... तो उसे इस नीरज से अच्छा लड़का मिल सकता है।

नीरज office से आता तो पहले की ही तरह शगुन को कॉल करता। फ़ोन इग्नोर होने लगे अब। एक दिन खबर आती है कि मुझसे बात मत किया करो... घर वालों ने मना किया है।

नीरज को ये नया बहाना समझ नहीं आया।
उसने ने बहुत कॉल किये...उसे whatsapp फेसबुक जहाँ हो सकता था, वहां से try किया...पर परिणाम वही...कुछ भी सकारात्मक नहीं हुआ। वो अब हर जगह से block हो चुका था।

उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था....क्या करे...कि क्या हुआ? इधर गाँव में बात फैलने लगी कि नीरज की शादी टूट गयी। लड़की वाले ये बहाना देने लगे कि लड़का नौकरी करने नहीं देना चाहता था लडक़ी को... और उसे अभी नौकरी करने से मना कर रहा है....और भी न जाने क्या क्या।

नीरज confuse है कि हुआ क्या...? उसे अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा कि हुआ क्या? उसका प्यार, उसकी मंगेतर...शगुन...उससे बात क्यों नहीं कर रही? पहले तो सब ठीक था...अभी क्या हो गया उसको। वह सोच में डूबा है कि कहाँ गलती कर दी उसने..।

लेकिन नीरज के पिताजी नीरज की तरह confuse नहीं हैं। उन्हें सब साफ साफ दिखता है। दुनिया देखी है... तो दुनियादारी की समझ है। उन्हें पता है कि रिश्ता क्यों टूट रहा। वो अपने बेटे को यही बात समझाना चाहते हैं... और सही समय का इंतज़ार कर रहे हैं.....।

**(--जंग)**