Sunday, 12 November 2017

एक जिंदगी ऐसी भी

|| एक जिंदगी ऐसी भी ||

दिल्ली मेट्रो के राजौरी गार्डन की बात है | किसी काम के सिलसिले में मेरे गाँव से मेरे बड़े भाई और चाचा आये थे | मैं उनसे मिलने गुडगाँव से दिल्ली गया था |

हलकी हलकी बारिश हो रही थी | मेट्रो से निकलते ही मैंने उन्हें फ़ोन किया | उन्होंने एड्रेस बता दिया | अब आसपास किसी से पूछ कर मुझे बताये पते पर जाना था | मैंने एक ठेले वाले से पता पूछा | पास में ही जाना था | चूँकि हलकी बारिश हो रही थी और पता भी पास था , इसलिए मैंने  निर्णय लिया की बारिश थमने के बाद मिलने जाऊंगा | इसलिए मेट्रो के नीचे  निकलते ही बाहर एक पिलर के पास बैठ गया |


थोड़ी देर इंतज़ार किया बारिश थमने का | पर बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी |  अब मुझे भूख लगी | तो खाने चला गया | ठेले से कुछ समोसे खाने के बाद फिर उसी जगह आकर बैठा | कुछ देर बैठा था कि एक बूढा आदमी सामने सड़क से गुजरता दिखा | मैले कपडे पहने वह आदमी एक ठेले को धकेल कर लेकर जा रहा था | शायद पानी बेचने वाला ठेला था | शरीर से काफी दुबला था | ऐसा लग रहा था कि बड़ी मुश्किल से वह से ठेले को धकेल पा रहा था |

फिर मैं एक सोच में डूब गया कि ये आदमी कितने सालों से इस ठेले को धकेल रहा होगा | अब शरीर भी जवाब देने लगा है | और ऐसे ही आखिर कब तक धकेलता रहेगा ?

अब वो ठेला मात्र ठेला नहीं दिख रहा था मुझे | मुझे दिख रही थी एक बूढ़े आदमी की जिंदगी |
शायद वो उस सड़क पर एक ठेला नहीं बल्कि अपनी जिंदगी धकेल रहा था |


--जंग

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