Saturday, 27 January 2018

कम्बल ! कोई तो हटा दो !

नींद पूरी हो चुकी है | टाइम देखने के लिए मेरा दाहिना हाथ अपने आप मोबाइल टटोलने लगा |
कम्बल के अंदर ही मोबाइल चेहरेके पास लाया | फिर बड़ी मुश्किल से एक आँख खोली और
मोबाइल स्क्रीन को देखा  | साढ़े आठ बज रहे थे | तुरंत होशियार मन ने बोला कि अभी तो साढ़े आठ
ही हो रहे और वैसे भी आज संडे है | फिर क्या था , खुला हुआ आँख बंद | फिर कम्बल एडजस्ट और
नींद के आगोश में | फिर कुछ देर बाद आँख खुली | अभी नौ बज गए | अब तो बस उठना ही था | इसलिए मैंने
यू ट्यूब पे मॉर्निगं सांग लगा दिया | दंगल और सुलतान के गाने चले | मैं अभी भी कम्बल में ही |
पैर, हाथ में एनर्जी आ गयी है | अब तो शरीर भी संगीत से हिलने लगा है | अब तो बस उठने ही वाला था मैं
कि अचानक गाना बंद | क्या हुआ ? अरे किसी का फ़ोन आया | मेरी इच्छा तो थी कि कम्बल से हाथ निकाल
कर फ़ोन उठया जाए मगर हिम्मत न हो पायी | अपने आप फ़ोन रिंग ओवर हो गया और यूट्यूब भी बंद |
अब न दंगल उठा पा रहा है मुझको, न ही सुल्तान | न हाथ कम्बल के बाहर
जाकर दुबारा क्लिक करने की कोशिश करना चाहता है |

अरे यार ये कम्बल ! कोई तो हटा दो ! 

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