डी एल एफ फेज तीन की एक गली । फेज तीन के मेट्रो स्टेशन के बिलकुल पास । शाम को ऑफिस से आ रहा था । बहुत भूख लगी थी । एक दूकान पर कई लोग भीड़ लगा कर खड़े थे । पास गया तो पता चला कि एग रोल के लिए सब खड़े हैं। मैंने भी एक एग रोल आर्डर कर दिया । उसके बाद सबकी तरह मैं भी एग रोल का इंतज़ार करने लगा । दरअसल बारह से पंद्रह लोग होंगे जो दो झुण्ड में एग रोल का इंतज़ार कर रहे । काफी देर बाद मेरा नंबर आया । उसने पूछा पैक करना है क्या ? मैंने बोला -नही । फिर उसने रोल बना कर दे दिया । मैंने उसे पैसे दिए और रोल लेकर चल पड़ा । एक बाइट लिया और पहुँच गया ,दूर अपने अतीत में । कि कैसे स्कूल की छुट्टी होते ही हम सारे बच्चे बस्ता पीठ पर टाँगे हुए , हाथ में में मोटी पटरी घूमते हुए पगडण्डी पर दौड़ते । गेंहू के खेतों में छूपते , एक दुसरे को छूते हुए बड़ी तेजी से ' हुर्री - हुर्री ' बोलते हुए ख़ुशी -ख़ुशी घर जाते थे । घर पहुँच कर मैंने दौड़ कर खूँटी पर बस्ता रखा । फिर रसोईं घर में पहुँच गया । जहाँ माँ अभी खाना बना रही थी । माँ कढ़ाई में तरी वाली आलू की सब्जी बना रही थी , जो की पंद्रह बीस मिनट बाद पकता । और साथ में रोटियां बेल रही थी । मैं घुस गया रसोईं में और माँ से बोला । ' माई ! बहुत भूख़ लागी है । कुछ दो न ' । उसके बाद माँ ने कढ़ाई में कलछल डाला और तरी वाली सब्जी से सिर्फ आलू निकाला और उसे रोटी पर रख दिया । फिर उसे फटाक से लपेटकर मुझे पकड़ा दिया । मैंने रोल की हुई रोटी पकड़ा और घर के बाहर चला गया । दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए । अचानक पीछे से कोई बाइक का हॉर्न बज रहा था । तो मैं वापस अपने आपको उस एग रोल वाली गली में पाता हूँ । हाथ में एग रोल अभी भी है । मैं सॉरी सॉरी बोल कर रास्ते से हटा । फिर एग रोल की एक और और बाईट ली ,और हल्की मुस्कान के साथ मैं आगे बढ़ गया ।
--जंग बहादुर पटेल

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