आज सुबह से ही सोच रहा था की ऑफिस जाऊं की नहीं | फिर फाइनली मैंने डिसाइड किया कि चलो ऑफिस चलेंगे लेकिन लेट | मैं और मेरा दोस्त 'Anil' साढ़े नौ बजे के आस पास मालवीय नगर से मेट्रो पकड़ते हैं और चल पड़ते हैं , अपने ऑफिस कि ओर | ऑफिस कि ओर बोल तो दिया , मगर असल में हम उस जिंदगी कि ओर जा रहे थे , जिसमें न तो कोई उमंग है , न कोई उम्मीद | वही घिसी पिटी जिंदगी | मेट्रो से उतरकर हम एक शेयरिंग कैब लेते हैं सिकन्दरपुर से | कैब में तीन कि सीट पर चार एडजस्ट कर के बैठे | और ग्यारह लोगो से ठसाठस भरी वैन अब चल पड़ी ग्वाल पहाड़ी | वैन कि विंडो ओपन थी और मैं विंडो के पास | चारों तरफ ऊँची -ऊँची बिल्डिंग्स से घिरी , और बीच में दूर तक फैली हरी- हरी बबूल कि झाड़ियाँ | और इन झाड़ियों के बीच से होकर गुजरती ग्वाल पहाड़ी कि सुन्दर , सर्पाकार सड़क | उस वैन में आज मेरे लिए हर रोज से कुछ डिफरेंट था | हरयाणवी और पंजाबी से डिफरेंट आज मधुर आवाज में सन् ६० का कोई पुराना गीत बज रहा था | हलकी हलकी हवा के साथ ये गीत मन को और मधुर करता जा रहा था | रोज कि घिसी पिटी जिंदगी से जूझने कि हिम्मत तो नहीं कह सकता , पर थोड़ी देर के लिए इस जिंदगी में आनंद जरूर भर गई |
-- 'जंग'
-- 'जंग'
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