कितने ही बच्चें, आदमी
औरतें और युवतियाँ
बलि चढ़ा दी जाती हैं
दंगे रूपी हैवान को ।
जो निगल जाता है
मानवता को
शहर को
सेंककर
नफ़रत से उत्पन्न आग में
और इस आग से लगी
आग की लपटों में।
हैवान... जो रहता है अदृश्य रूप में
हर इंसान के भीतर
एक छोटा सा शैतान बनकर ।
और जब
ऐसे ही छोटे-छोटे
ढेर सारे शैतान
मिलते हैं
दूसरे शैतान से
तो खिलखिला के हँस पड़ते हैं
और
टूट पड़ते हैं
राह में आयी
हर वस्तु,
औरत,
आदमी पर
बनकर एक हैवान ।
सौ शैतानों वाला हैवान ।
दंगा रूपी हैवान ।
इन्हीं में से कोई एक शैतान
झटके से रखता है बंदूक
कनपटी पर
और फिर वस्त्र
छोड़ देती है औरत का बदन
और लुढ़क जाती है पैरों पर उसके
और बैठ जाती है
सिमटकर
दुबककर...
रह जाता है खुला
बिल्कुल खुला
उसका नंगा बदन।
और फिर कुछ भेड़िये
( जो छोटे शैतान हैं )
उसे नोंच लेते हैं
और उसके जाँघों के बीच अपना
कील ठोंक देते हैं
फिर ?
और फिर निकल जाता है
जाँघों से उसके
खून की कुछ धार
मारकर फव्वार
और कर देती है
उस दानव का लिंग... लाल।
सड़क... लाल
हाथ... लाल
हथियार... लाल
बस, ट्रेन, दीवार... लाल
और वह दानव निकलता
करके अपनी आँखें... लाल।
फ़िर कुछ समय बाद
सब ख़ाक हो जाता है
मिलकर आग से
उस दंगे रूपी हैवान से।
और अगले दिन
निकलता है
मासिक धर्म में सने लत्ते सा सूरज
लाल...
गहरा लाल...
--जंग
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