Friday, 17 July 2020

तितली

।। तितली।।

पता है?
आयी है आज
एक तितली
छत के उसी कोने पर
जहाँ बैठकर तुम मुझे
आलिंगन में लेती थी

पंख पर धारीयाँ उसके
तुम्हारी लाल चुन्नी याद है न?
बिल्कुल उसी तरह
चटकीले और ख़ुशनुमा रंगों से लबालब।

तुम्हारे होंठों से -
उसके पंख
खुलते भी उसी तरह
जब उड़ती हवा में वो

फिर कुछ देर उड़
बैठ जाती है पौधे पर
उसी पौधे पर
जो तुमने गिफ्ट किया था।

पता है?
एक फूल खिला है
वो भी लाल ही है

तुम्हें लाल रंग इतना भाता जो था
कि गिफ़्ट भी दिया था तो
लाल फूल वाला।

ये कह के दिया
'ये मेरी याद दिलाएगी तुम्हें'।

मुझे नीला पसंद था।

पर अब ना?
लाल रंग से मुहब्बत सी हो गयी है।

फ़िर उड़ कर बैठ जाती है,
उसी रस्सी पर
जिसपे तुम कपड़े सुखाती थी।

जब भी कभी कहीं
कोई रस्सी देखता हूँ
तो सिहर जाता हूँ
काँप जाता हूँ
डर जाता हूँ
कौंध कर कूद जाती है
ज़ेहन में
उस दिन की
वह भयावह रात।

कि कैसे मैं तुम्हारी हिफाज़त न कर सका
उन वहसी दरिंदों से
घायल किया मुझे
बेसुध पड़ा सड़क पर मैं।

लूट ली अस्मत।

भाग कर आया था
जब घर को मैं
झूल चुकी थी तुम
रस्सी के सहारे।

बस।

उड़ गयी है तितली
अब।
तुम्हारी तरह ही।

--जंग

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